कोरोना की मार से घायल हुआ बचपन…!! सामाजिक सेवा में अग्रसर प्रा. सविता बेदरकर की फेसबुक वॉल से एक इंसानियत झलकाती पोस्ट…

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गोंदिया। 15 मई
मै बैंक की तरफ से आ रही थी तो स्टेडियम के दुकान की चौखट में दो बच्चे सब्जी बेचते दिखे। कुछ दूर गई और मैं फिर वापस आ गई इनको बोली मैं …रुको बड़े मासूम बच्चे दिख रहे यह बोले.. दुनिया में आखिर किस किस के आंसू पोछेंगे?
बच्चों के पास गई.. अंकल आंटी सब्जी लेलो… मैं बोली यह सब्जियां बेटा यह सब मेरे खेत में है! बेटा
इस उम्र में सब्जियां क्यों बेच रहे हो ओ बोले पैसे के लिए ?मै बोली पैसों का क्या कररोगे वह बोले घर में जाकर खाना बनाएंगे…
मां बाप नहीं है तुम्हारे ? ओ बोले मां है जो भीख मांगती है और करोना में भीख भी नहीं मिलती और बाप कब का चला गया?
मै बोली स्कूल नहीं पढ़ते वो बोले हा हां पढ़ते हैं, जिला परिषद स्कूल में… सरनेम वरकडे बताया।

मेरे पास ₹100 थे दोनों के हाथ में 50 ₹50 देके मैं बोली यहीं रुको मैं तुम्हारे लिए चावल का बंदोबस्त कर देती हूं । मै घर लौट के पाच पाच किलो चावल पकड़कर और गई ।जाते जाते राधा भाभी को बोली बच्चे भूखे हैं …उन्होंने पूरी सब्जी दो प्लेट बंद कर दी वह पकड़ के बच्चों के पास गई ।दोनों को सब्जी पूरी दी और पांच 5 किलो चावल देके घर वापस लौटी।

आप बोलोगे यह कोई बताने की चीज है पांच 5 किलो चावल….???
यह बच्चे जिला परिषद स्कूल के बच्चे हैं क्या गांव की स्कूल की और वहां के शिक्षकों की नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती कि कोई भी बच्चा भूखा न रहे।

कोरोना के कारण बहुत से मां-बाप का रोजगार छिन गया ऐसे में छोटे-छोटे बच्चे अपने घर के बुजुर्ग बन गए और वह जैसा भी मिला वैसे काम करके घर वालों को पालने का काम कर रहे हैं।

यहा आंखें सबको है,,… नजर सबको है …लेकिन देखने का नजरिया बहुत कम लोगों के पास रहता है।
जिसके पास दांत है चने नहीं और जिसके पास चने है उसके पास दात नहीं।

हम अगर एक मुट्ठी चावल रोज अपने घर में जमा किए ..जितना दिया लगाने के लिए तेल डालते हैं ना उतना तेल जमा किए तो यहां का कोई भी बच्चा कोई भी इंसान भूखा नहीं रह सकता।

कोरोना के कारण केवल लोगों का रोजगार नहीं छीना उनके बच्चों का बचपन भी घायल हुआ… उनका बचपन भी छीना। हम अपने बच्चों के लिए तो बहुत कुछ सोचते है कभी दूसरों के बच्चे के लिए भी सोच कर देखो?

… यह सिर्फ कहने सुनने की बात है कि बचपन हर गम से बेगाना होता है… इंडिया में भी एक गरीब भारत बसता है…..

-सविता बेदरकर

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