GONDIA: विदर्भ राज्य की मांग पर फिर गरजे विदर्भवादी, ‘नागपुर में विदर्भ-विदर्भ चिल्लाते हैं, मुंबई जाकर विदर्भ को सौतन समझते हैं’

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वामनराव चटप और छैलबिहारी अग्रवाल का विदर्भ के नेताओं पर तीखा हमला

प्रतिनिधि| 19 सितंबर

गोंदिया। पृथक विदर्भ राज्य की वर्षों पुरानी मांग को लेकर विदर्भ राज्य आंदोलन समिति ने एक बार फिर आंदोलन को निर्णायक दिशा देने का ऐलान किया है। गोंदिया के शासकीय विश्रामगृह में आयोजित पत्रकार परिषद में समिति के अध्यक्ष एवं पूर्व विधायक एड. वामनराव चटप, जिलाध्यक्ष छैलबिहारी अग्रवाल, युवा आघाड़ी अध्यक्ष मुकेश मासुरकर, पूर्व विदर्भ अध्यक्ष अरुण भाऊ केदार, पश्चिम विदर्भ अध्यक्ष डॉ. पीआर राऊत, डॉ. सौ. प्रज्ञाताई राजपूत, संजय केवट, अतुल सतदेवे, अरुण बन्नाटे, राखी भारद्वाज, दिलीप गौतम, भानुदास ठाकरे, वसंत गवळी, पीएस बिसेन सहित विदर्भवादी नेताओं ने केंद्र एवं राज्य सरकार के साथ-साथ विदर्भ के नेताओं की भूमिका पर सवाल उठाते हुए आगामी दिनों में आंदोलन को और तीखा करने के संकेत दिए।

नेताओं ने कहा कि यदि पृथक विदर्भ राज्य की मांग पर ठोस पहल नहीं हुई तो आंदोलन को गांव-गांव तक पहुंचाने के साथ ही जनप्रतिनिधियों के घेराव और व्यापक जनआंदोलन का रास्ता अपनाया जाएगा।

समिति की ओर से जारी भूमिका के अनुसार, 31 दिसंबर 2027 तक स्वतंत्र विदर्भ राज्य हासिल करने के संकल्प के साथ विदर्भ के 11 जिलों और 120 तहसीलों में जनजागरण अभियान चलाया जा रहा है। समिति ने आरोप लगाया कि 1953 के नागपुर करार में विदर्भ के हितों को लेकर किए गए प्रावधानों की अनदेखी के कारण क्षेत्र के साथ अन्याय की स्थिति बनी हुई है। इसी मुद्दे को लेकर आगामी आंदोलन को व्यापक स्वरूप देने की तैयारी की जा रही है।

पत्रकार परिषद में आंदोलन की आगामी रूपरेखा भी घोषित की गई। समिति के अध्यक्ष एवं पूर्व विधायक वामनराव चटप ने कहा कि, आगामी 7 दिसंबर को नागपुर में शीतकालीन अधिवेशन के दौरान हल्लाबोल आंदोलन करने की घोषणा की गई। इस दौरान ‘नेताओं वापस जाओ’ जैसे नारों के साथ विदर्भ के जनप्रतिनिधियों से पृथक राज्य के सवाल पर अपना स्पष्ट रुख बताने की मांग की जाएगी। 27 दिसंबर को गोंदिया में विशाल महिला सम्मेलन, जबकि 16 जनवरी को नागपुर में महासम्मेलन आयोजित करने की जानकारी दी गई। नेताओं ने स्पष्ट संकेत दिया कि 30 जून के बाद आंदोलन को और उग्र रूप दिया जाएगा।

प्रखर विदर्भवादी नेता श्री चटप ने आंदोलन को व्यापक सामाजिक समर्थन से जोड़ने की रणनीति भी सामने रखी। अन्य विदर्भ समर्थक संगठनों एवं टीमों को साथ लेने के साथ ही सीजेपी के जेन-जी समर्थकों को आंदोलन से जोड़ने की बात कही गई। इसके अलावा विदर्भ के नेताओं का घेराव कर उनसे पृथक विदर्भ के मुद्दे पर जवाब मांगने की रणनीति भी पत्रकार परिषद में रखी गई।

जिलाध्यक्ष छैलबिहारी अग्रवाल ने विदर्भ के नेताओं पर तीखा हमला बोलते हुए उन्हें अपना ‘पुरुषार्थ’ जगाने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि विदर्भ में रहने पर नेता ‘विदर्भ-विदर्भ’ चिल्लाते हैं, लेकिन मुंबई पहुंचने के बाद विदर्भ के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं, जैसे वह उनका अपना हिस्सा नहीं, बल्कि ‘सौतन’ हो। अग्रवाल ने सवाल उठाया कि यदि विदर्भ के संसाधनों और समस्याओं को लेकर नेता वास्तव में गंभीर हैं तो उन्हें मुंबई में भी उसी मजबूती से पृथक विदर्भ की आवाज उठानी चाहिए।

समिति ने विदर्भ की आर्थिक स्थिति को भी पृथक राज्य की मांग का प्रमुख आधार बताया। पत्रकार परिषद में रखे गए निवेदन में राज्य की आय-व्यय, कर्ज, ब्याज के बोझ, ठेकेदारों की देनदारी तथा किसान कर्जमाफी पर होने वाले खर्च का उल्लेख करते हुए दावा किया गया कि मौजूदा आर्थिक ढांचे में विदर्भ के विकास से जुड़े सिंचाई, उद्योग, ऊर्जा, शिक्षा, सड़क, पेयजल, आदिवासी विकास और सामाजिक न्याय जैसे क्षेत्रों की जरूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं। समिति ने दावा किया कि विदर्भ में बड़ी संख्या में सिंचाई परियोजनाएं अधूरी हैं, जिसके चलते खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

नेताओं ने कहा कि किसानों की आत्महत्या, कुपोषण, बेरोजगारी और पलायन जैसे सवाल केवल आर्थिक पैकेज या अनुदान से हल नहीं होंगे। उनका कहना था कि विदर्भ को अलग राज्य का दर्जा मिलने से क्षेत्र के संसाधनों और विकास नियोजन पर स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की क्षमता बढ़ेगी। इसी आधार पर समिति ने ‘दान नहीं चाहिए, अनुदान नहीं चाहिए, हमें तो सिर्फ विदर्भ राज्य चाहिए’ का नारा बुलंद किया।

पत्रकार परिषद में नेताओं ने यह भी संकेत दिया कि अब आंदोलन केवल ज्ञापन, निवेदन और प्रतीकात्मक प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहेगा। जनजागरण, हल्लाबोल, महासम्मेलन, महिला शक्ति की भागीदारी और जनप्रतिनिधियों के घेराव के जरिए आंदोलन को व्यापक स्वरूप देने की तैयारी है। समिति ने साफ किया कि पृथक विदर्भ के मुद्दे पर आगामी चरणों में आंदोलन की धार और तेज की जाएगी। इससे विदर्भ राज्य की वर्षों पुरानी मांग एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आने के संकेत मिले हैं।

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