नागपुर पदवीधर विप चुनाव: इस चुनाव में डिग्रीधारी बनेंगे ‘सरप्राइज फैक्टर’, ‘वंजारी vs कोहळे’ में रोमांचक मुकाबला

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संवाददाता।
गोंदिया। नागपुर विभाग पदवीधर मतदारसंघ का चुनाव इस बार महज विधान परिषद की एक सीट हासिल करने की राजनीतिक जंग नहीं रह गया है। बल्कि ये चुनाव अब शिक्षित युवाओं के हक, अधिकारों की आवाज के रूप में देखा जा रहा है। इस सीट से कांग्रेस आघाड़ी के मौजूदा विधायक अभिजित वंजारी और भाजपा महायुति के सुधाकर कोहळे आमने-सामने हैं और दोनों के लिए यह चुनाव अपने-अपने राजनीतिक प्रभाव, संगठनात्मक ताकत और मतदाताओं के बीच स्वीकार्यता की परीक्षा बन गया है। वंजारी के पूर्व ये सीट भाजपा के सोले के पास थी। पिछले चुनाव में भाजपा ने सोले को टिकट न देते हुए संदीप जोशी को मैदान में उतारा था, जहाँ जोशी को पछाड़कर वंजारी विजयी हुए थे। वर्तमान चुनाव में भी सोले को भाजपा ने टिकट नहीं दी, जिससे ये बागी होकर चुनाव मैदान में थे, पर एन मौके पर मुख्यमंत्री फडणवीस, राजस्व मंत्री बावनकुले, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष चौहान ने उन्हें मनाने में कामयाबी हासिल कर ली। कांग्रेस ने पुनः वंजारी को मौका दिया है। एक ओर कांग्रेस वंजारी के जरिए अपने मौजूदा जनाधार को बचाए रखने की कोशिश में है, तो दूसरी ओर भाजपा इस सीट पर अपना प्रभाव फिर मजबूत करने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है।
लेकिन इस चुनाव का असली सवाल राजनीतिक नारों से कहीं बड़ा है। जिस मतदाता के हाथ में मतपत्र होगा, उसके हाथ में डिग्री भी है और बेरोजगारी का अनुभव भी। पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी की तलाश में भटकता युवा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों गुजारने वाला स्नातक, निजी क्षेत्र में अस्थिर रोजगार करने वाला शिक्षित वर्ग, कम वेतन और बढ़ती महंगाई से जूझता युवा—क्या इस चुनाव में उसकी आवाज राजनीतिक दलों के नारों पर भारी पड़ेगी? यही इस चुनाव की सबसे बड़ी कसौटी है।
देश की राजनीति आज जिस दौर से गुजर रही है, उसमें चुनाव केवल सत्ता पक्ष बनाम विपक्ष का मुकाबला नहीं रह गया है। रोजगार, महंगाई, शिक्षा, सरकारी नौकरियों में अवसर, भर्ती प्रक्रिया, परीक्षा व्यवस्था, पारदर्शिता और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दे लगातार राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। ऐसे में पदवीधर मतदारसंघ का मतदाता सामान्य चुनावी मतदाता से अलग अपेक्षा रखता है। वह भाषण से अधिक काम का हिसाब, घोषणा से अधिक परिणाम और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अधिक अपने भविष्य की दिशा देखना चाहता है।
अभिजित वंजारी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पिछले कार्यकाल का रिपोर्ट कार्ड मतदाताओं के सामने रखने की है। कांग्रेस उनके जरिए यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि पदवीधर मतदारसंघ में सरकार के खिलाफ शिक्षित वर्ग की नाराजगी को राजनीतिक विकल्प में बदला जा सकता है। कांग्रेस नेताओं ने भी इस चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बताते हुए एकजुट होकर प्रचार करने का आह्वान किया है।
वहीं सुधाकर कोहळे के सामने चुनौती अलग है। भाजपा के लिए यह चुनाव केवल कोहळे की व्यक्तिगत जीत नहीं, बल्कि नागपुर—जो मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितीन गडकरी का राजनीतिक गढ़ माना जाता है—में संगठन की पकड़ और महायुति की स्वीकार्यता साबित करने का अवसर भी है। कोहळे का प्रचार शिक्षकों और अन्य पदवीधर वर्गों से संपर्क तथा उनकी समस्याएं समझने पर केंद्रित रहा है।
इस चुनाव ने भाजपा के भीतर की खींचतान को भी सुर्खियों में ला दिया था। पूर्व विधायक प्रा. अनिल सोले की बगावत ने कुछ समय के लिए मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की संभावना पैदा कर दी थी, लेकिन बाद में सोले के पीछे हटने और भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार के समर्थन में आने से मुकाबला फिर मुख्य रूप से वंजारी बनाम कोहळे पर केंद्रित हो गया।
अब असली मुकाबला संगठन बनाम व्यक्तिगत संपर्क, सत्ता का प्रभाव बनाम सरकार से सवाल, और राजनीतिक समीकरण बनाम पदवीधर मतदाता की नाराजगी के बीच दिखाई दे रहा है। नागपुर विभाग के विभिन्न जिलों में फैले पदवीधर मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए दोनों खेमे अंतिम दौर में पूरी ताकत लगा रहे हैं। प्रशासन ने मतदान के लिए 446 मतदान केंद्र तैयार किए हैं, जिससे चुनाव की व्यापकता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह चुनाव उन लोगों के बीच हो रहा है जिनसे लोकतंत्र सबसे ज्यादा उम्मीद करता है—शिक्षित मतदाताओं के बीच। इसलिए सवाल यह भी है कि क्या इस बार डिग्रीधारी मतदाता जाति, दल और परंपरागत राजनीतिक निष्ठा से ऊपर उठकर रोजगार, शिक्षा, महंगाई और अपने भविष्य को प्राथमिकता देगा? 23 अक्टूबर को मतपेटी में पड़ने वाला हर ‘1’ वोट इसी सवाल का जवाब होगा।
वंजारी अपनी सीट बचा पाएंगे या कोहळे भाजपा के लिए नया राजनीतिक अध्याय लिखेंगे? इसका फैसला सिर्फ चुनावी रणनीति नहीं करेगी। अंतिम फैसला उस पदवीधर के हाथ में होगा, जिसकी डिग्री के साथ आज सबसे बड़ा सवाल जुड़ा है—“पढ़ाई तो पूरी हो गई, अब भविष्य कब बदलेगा?”  पदवीधर मतदाता का मूड इस बार सबसे बड़ा ‘सरप्राइज फैक्टर’ बन सकता है।

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