गोंदिया: आजाद भारत में फॉरेस्ट अधिकारियों की हिटलरशाही, वननिवासियों के साथ बदसलूकी..

726 Views

जांभड़ी/दोड़के में बड़ा तनाव, ठेकेदारों को फायदा पहुँचाने, संकलित तेंदुपत्ता को जबरन उठाने पहुँचे फॉरेस्ट अधिकारी, तेंदुपत्ता को क्षत-विक्षत कर किया आर्थीक नुकसान

प्रतिनिधि।
गोंदिया। गोंदिया जिला वनजंगल से घिरा हुआ है। यहां की अधिक आबादी वनजंगल में निवास करती है। केंद्र सरकार ने इन वन निवासी अनुसूचित जाति/जमाती व अन्य पारंपरिक वन निवासियों को वन अधिकार कानून 2006, नियम 2008 व सुधारित अधिनियम 2012 के तहत जीवन जीने का अधिकार व अनेक मामलों में स्वामित्व अधिकार प्रदान किया है। बावजूद फोरेस्ट अधिकारियों द्वारा इन्हें मिलें अधिकारों का हनन कर उनपर अन्याय व अत्याचार किया जा रहा है।
 14 मई 2022 को गोंदिया के फॉरेस्ट अधिकारी सहायक वन संरक्षक (तेंदू कैम्प) आर आर सदगीर, सहायक वन संरक्षक (रोहयो) प्रदीप पाटील अपने सैकड़ो कर्मी व पुलिस के दलबल को लेकर सड़क अर्जुनी तहसील के जांभड़ी/दोड़के पहुँचे। वन अधिकारियों ने सामुहिक वन हक्क व्यवस्थापन समिति (ग्रामसभा) द्वारा संकलित कर रखे गए तेंदूपत्ता को जबरन ये कहकर उठाने का प्रयास किया कि उन्हें वन हक्क का दावा प्राप्त नहीं हुआ, इसलिए तेंदुपत्ता संकलन करने का अधिकार नहीं।
इस मामले पर जांभड़ी/दोड़के में वन निवासियों एवं अधिकारियों के बीच तनाव की स्थिति निर्माण हुई। वन निवासियों ने कहा कि वन अधिकारी आजाद भारत में अनुसूचित जाति/जमाती के वन निवासियों को मिले अधिकारों से वंचित कर हिटलर शाही रवैया अपना रहे है।
वन अधिकारियों द्वारा वन निवासियों के साथ हुई बदसलूकी, महिलाओं से अभद्र व्यवहार एवं संकलित तेंदुपत्ता की क्षति कर आर्थिक नुकसान पहुँचाने पर डुग्गीपार पुलिस थाने में अनुसूचित जाति/जमाती अन्याय व अत्याचार प्रतिबंधक कानून व वन हक्क कानून 2006 (फारेस्ट राइट एक्ट 2006) व अनुसूचित जाति/जमाती प्रतिबंधक कानून सुधारित 2015 अंतर्गत मामला दर्ज करने लिखित रिपोर्ट दर्ज कराई है। साथ ही दो दिनों के भीतर कार्रवाई न करने पर आंदोलन के संकेत दिए है।

क्या था पूरा मामला…

दरअसल वन निवासियों को जिसमें अनुसूचित जाति/जमाती व अन्य पारंपरिक वन निवासियों को वन अधिकार कानून 2006 के नियम 2008 व सुधारित नियम 2012 की कलम 3(1)(ग) अंतगर्त  स्वामित्व का अधिकार प्राप्त है। इसके तहत गाँव की सीमा अंतर्गत व बाहर (पारंपरिक क्षेत्र) में जमा किया जाने वाला गौण वन उत्पादन (तेंदुपत्ता, मोहा फूल आदि) संकलित करने, उसका उपयोग करने, उसकी बिक्री करने, उसपर प्रक्रिया करने का अधिकार व स्वामित्व प्राप्त है। इसी तरह वन हक्क 2006 नियम 2012 की कलम 2 (घ) व अधिनियम की कलम 3 की सह कलम (1) के खंड (ग) अंतर्गत संकलित वनोंत्पादन पर प्रक्रिया करने, उसकी बिक्री, उसपर व्यक्तिक या सामूहिक तौर पर प्रकिया करने, संकलन करने, उसका मूल्यवर्धन करने, उनके उपजीविका हेतु संस्था, संघ या महासंघ के माध्यम से वन उत्पादन की ढुलाई व ढुलाई हेतु यातायात लाइसेंस देने का अधिकार है।
तेंदुपत्ता ठेकेदार से मिलते थे ढाई रुपया प्रति तेंदू बंडल, महासंघ के माध्यम से मिलते है साढ़े आठ रुपया प्रति बंडल
देश की न्यायपालिका संसद द्वारा अधिकार दिए जाने पर वन निवासियों ने शासन दर अनुसार ठेकेदार द्वारा तेंदुपत्ता की तुड़वाई करवाकर 70 पत्तो के एक बंडल पर ढाई रुपये घोषित किया है, परंतु जान जोखिम में डालकर पत्ता तुड़वाई करने वालों को इन कम पैसे के चलते उन्होंने अपनी जीविका को सुधारने इसी कानून का लाभ उठाकर 14-15 गाँव को मिलाकर एक ग्रामसभा महासंघ बनाया। इस ग्राम सभा महासंघ के अंतर्गत ग्रामसभा है जिसके अंतर्गत वन निवासी तेंदुपत्ता संकलन करते है। ग्राम सभा महासंघ उसकी निविदा निकालते है एवं इसी 70 पत्तो के एक बंडल की तुड़वाई वन निवासी की ढाई रुपये की जगह साढ़े आठ रुपये मिले ये व्यवस्था करते है। कुल मिलाकर ये पैसे सीधे तुड़वाई करने वाले के खाते में जमा होते है।

खुद के फायदे के लिए 10 साल से लटकाकर रखा वन हक्क पट्टे का मामला

ग्रामसभा महासंघ देवरी के सचिव गजानन शिवनकर, सह सचिव चरणदास चौहान, सामूहिक वन हक्क व्यवस्थापन समिति (ग्रामसभा) जांभड़ी/दोड़के के अध्यक्ष नुतनकमार मंडारे, सचिव विजयकुमार सोनवाने ने कहा कि वन धारक ने ग्रामसभा जांभली के सामूहिक वन हक्क दावा प्रकरण क्र 1049/देवरी जांभली/दोड़के/15 अनुसार कुल 2438.06 हेक्टेयर आर क्षेत्र के दावे हेतु उपविभागीय अधिकारी कार्यालय को प्रस्ताव भेजा था। परंतु उस प्रस्ताव को जानबूझकर 10 साल से लटकाकर रखा गया और वन निवासियों को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया।
उन्होंने कहा कि आज ये अधिकारी वन हक्क पट्टे जांभली-दोड़के को प्राप्त नही कहकर संकलित तेंदू पत्ते उठाने आये। उन्होंने उन 40-50 गांव को भी देखना चाहिए जहां वनपट्टे प्राप्त न होकर तेंदुपत्ता संकलित हो रहा है। और ठेकेदार द्वारा उठाया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि वन अधिकारी कुल मिलाकर वन निवासियों का अधिकार छीनकर ठेकेदारों को फायदा पहुँचाना चाहते है। ये हम होने नही देंगे। अगर दो दिन में इन अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हुई तो हमें आंदोलन का रास्ता अख्तियार करना पड़ेगा।

Related posts